दिगम्बर जैन महापर्व पर्यूषण या (10) दशलक्षण धर्म

दिगम्बर जैन महापर्व पर्यूषण या दशलक्षण धर्म

जैनों का सबसे पवित्र पर्व दशलक्षण या पर्यूषण पर्व हैं। दशलक्षण महापर्व वीतरागता का पोषक त्याग, तपस्या, संयम एवं साधना का पर्व हैं। पर्युषण का एक अर्थ है – कर्मों का नाश करना।

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कब मनाया जाता है पर्यूषण पर या दशलक्षण धर्म का पूजन कब किया जाता है?

श्री दशलक्षण पर्व वर्ष में तीन बार मनाए जाते हैं। दिगम्बर सम्प्रदाय में यह पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पचंमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है। इसके अलावा यह माघ शुक्ल पंचमी से माघ शुक्ल चतुर्दशी तक और चैत्र शुक्ल पंचमी से चैत्र शुक्ल चतुर्दशी तक भी मनाया जाता है। श्वेताम्बर समुदाय यह में भाद्र कृष्णा द्वादशी से भाद्र शुक्ला चतुर्थी तक मनाया जाता है।

कैसे मनाया जाता है पर्यूषण पर्व या दशलक्षण धर्म

इन दिनों में जैन मंदिरों में खूब आनंद छाया रहता है। प्रतिदिन प्रातः काल से ही सब स्त्री-पुरुष स्नान करके मंदिरों में पहुँच जाते हैं और बड़े आनंद के साथ भगवान का पूजन करते हैं। पूजन समाप्त होने पर प्रतिदिन श्री तत्वार्थसूत्र के दस अध्यायों में से एक-एक अध्याय का व्याख्यान और उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आंकिन्चय और ब्रह्मचर्य- इन धर्मों में से एक-एक धर्म का विवेचन होता है। इन दस धर्मों के कारण इस पर्व को दशलक्षण पर्व कहते हैं, क्योंकि धर्म के उक्त दस लक्षणों का इस पर्व में खासतौर से आराधन किया जाता है। आश्विन कृष्णा प्रतिपदा के दिन पर्व की समाप्ति होने पर समाज के सब लोग एकत्र होकर परस्पर में गले मिलते हैं और गतवर्ष की अपनी गलतियों के लिए परस्पर में क्षमायाचना करते हैं।

सर्वधर्म समभाव
दिगंबर जैन मंदिर, ऊन
दिगम्बर जैन मंदिर, ऊन

पर्युषण में व्रत की साधना

इन दिनों में प्रायः सभी स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार व्रत-उपवास वगैरह करते हैं। कोई कोई दसों दिन उपवास करते हैं, बहुत से दसों दिन एक बार भोजन करते हैं। कोई नियम लेता है की २ अनाज से ज़्यादा का सेवन नहीं करेंगे या कोई गिनती की ही वस्तुएँ खाते है।

अनंत चतुर्दशी पर होता है पर्यूषण पर्व का समापन

भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी अनंत चतुर्दशी कहलाती है। इसका जैनों में बड़ा महत्व है। जैनशास्त्रों के अनुसार इन दिन व्रत करने से बड़ा लाभ होता है। दूसरे, यह दशलक्षण पर्व का अंतिम दिन भी है, इसलिए इस दिन प्रायः सभी जैन पुरुष-स्त्री व्रत रखते हैं और पूरा दिन मंदिर में बिताते हैं। अनेक स्थानों पर इस दिन जलूस भी निकलता है। कुछ लोग इन्द्र बनाकर जुलूस के साथ जल लाते हैं और उस जल से भगवान का अभिषेक करते हैं। फिर पूजन होता है और पूजन के बाद अनंत चर्तुदशी व्रत कथा होती है। जो व्रती निर्जल उपवास करते है; वे कथा सुनकर ही जल ग्रहण करते हैं।

क्या होते दसलक्षण धर्म या धर्म के दस लक्षण?

  1. क्षमा: शांत तथा समता भाव से अपने आप में क्लेश ना होने देना व क्रोध छोड़ना।
  2. मार्दव: मान नहीं करना, अहं छोडना।
  3. आर्जव: कपट नहीं करना, माया कपट छोडना।
  4. सत्य: सत्य वचन बोलना।
  5. शौच: लोभ नहीं करना।
  6. संयम: इन्द्रियों व मन को वश में करना।
  7. तप: इच्छायें छोड़ना।
  8. त्याग: त्याग करना।
  9. आकिंचन: परिग्रह का त्याग करना।
  10. ब्रह्मचर्य: विषय सेवन व यौन भावों को मन वचन काम से छोड़ना।
दिगम्बर जैन महापर्व पर्यूषण या दशलक्षण धर्म
दशलक्षण धर्म

दस धर्मों की व्याख्या

आइये जानते है दशलक्षण पर्व के विषय में विस्तार से-

पहला धर्म: उत्तम क्षमा (Supreme Forgiveness)

इस धर्म का पालन करते हुए हम जिन्होंने हमारे साथ अन्याय किया है उन्हें क्षमा करें और उनसे भी क्षमा मांगें जिन्होंने हमारे साथ अन्याय किया है। क्षमा न केवल मानव सहयोगियों से मांगी जाती है, बल्कि एक इंद्रिय से लेकर पांच तक के सभी जीवित प्राणियों से मांगी जाती है। यदि हम क्षमा नहीं करते हैं या क्षमा नहीं मांगते हैं, बल्कि आक्रोश रखते हैं, तो हम अपने ऊपर दुख लाते हैं और इस प्रक्रिया में अपने मन की शांति को भंग कर देते हैं। मुनि श्री प्रमाण सागर जी कहते है किसी ने आपके प्रति कोई दुर्व्यवहार किया, दुर्वचन कहा और कोई गलत कार्य किया। सामर्थ्य होने पर भी उसके अपकार को समता भाव से सह लेना, प्रतिकार नहीं करना ये क्षमा है। क्षमा धर्म आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप पर चिंतन करने के लिए प्रोत्साहित करके अपनी सही पहचान करना सिखाता है।

दूसरा धर्म : उत्तम मार्दव (Supreme Modesty)

यह धर्म हमें मान-अभिमान को छोड़ कर मन और विचारों में विनम्रता धारण करने को कहता है। धन, सुन्दर रूप, प्रतिष्ठित परिवार या बुद्धि अक्सर अभिमान की ओर ले जाती है। अभिमान का अर्थ है स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानना और दूसरों को नीचा देखना। अभिमान करके आप अस्थायी भौतिक वस्तुओं से अपना मूल्य माप रहे हैं। ये वस्तुएं या तो आपको छोड़ देंगी या जब आप मर जाएंगे तो आप उन्हें छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएंगे। विनम्र होने से इसे रोका जा सकेगा। अभिमान बुरे कर्मों या पाप कर्मों की ओर ले जाता है। कभी भी किसी को नीचा दिखाने का ना ही सोचना और करना। अभिमानी व्यक्ति अपना अपमान नहीं सह सकता और सदैव सम्मान की चाह रखता है। अतएव अभिमान को मन से हटा कर उत्तम मार्दव धर्म का पालन करें।

तीसरा धर्म : उत्तम आर्जव (Supreme Straightforwardness)

सहज जीवन व्यतीत करने के लिए अपने जीवन को भीतर से पहचानने की कोशिश करें। मन या दिमाग़ में कुछ हो और बाहर कुछ रहो तो जीवन का मजा नहीं हैं। जीवन का असल मजा केवल, भीतर और बाहर एक होने में हैं और भीतर- बाहर एक होने की इसी परिणति का नाम ‘आर्जव धर्म’ हैं। बनावटीपन, कुटिलता, जटिलता और कपट का अभाव ही उत्तम आर्जव धर्म का प्रारम्भ है। अतः सरल और सहज बने।

चौथा धर्म : उत्तम शौच (Supreme Contentment)

दशलक्षण धर्म का चौथा धर्म है उत्तम शौच। शौच यानी की पवित्रता। मन और मस्तिष्क की पवित्रता। नम्र आचरण और निर्मल विचार ही शौच धर्म है। यह धर्म हमें सिखाता है की अब तक आपने जो भौतिक लाभ प्राप्त किया है, उससे संतुष्ट रहें। आम धारणा के विपरीत,अधिक भौतिक धन और सुख के लिए प्रयास करने से सुख नहीं मिलेगा। अधिक की इच्छा इस बात की निशानी है कि हमारे पास वह सब नहीं है जो हम चाहते हैं। इस इच्छा को कम करने और हमारे पास जो कुछ भी है उससे संतोष रखना हमें आत्म संतुष्टि की ओर ले जाता है। भौतिक वस्तुओं का संचय केवल इच्छा की अग्नि को प्रज्वलित करता है। अतः मन से लालच और मेरा-मेरा के भाव को हटा कर उसमें संतोष का भाव लाये।

पाँचवाँ धर्म: उत्तम सत्य (Supreme Truth)

दशलक्षण धर्म के पाँचवे दिन अब तक हम सभी से क्षमा माँग चुके, सभी को क्षमा कर चुके, मान को मन से हटा चुके, कपट छोड़ चुके, और अपने मन को निर्मल कर चुके। अब समय है सत्य को अपनाने का। सत्य धर्म कहता है अगर बात करना जरूरी नहीं है, तो बात न करें। यदि आवश्यक हो तो कम से कम शब्दों का ही प्रयोग करें, और सब कुछ बिल्कुल सत्य होना चाहिए। बात करने से मन की शांति भंग होती है। उस व्यक्ति पर विचार करें जो झूठ बोलता है और उजागर होने के डर से रहता है। एक झूठ का समर्थन करने के लिए उसे सौ और बोलना पड़ता है। वह झूठ के जाल में फंस जाता है और उसे अविश्वसनीय के रूप में देखा जाता है। झूठ बोलने से पाप कर्म का प्रवाह होता है। अतः सत्य कहे और सरल रहे।

छँटा धर्म: उत्तम संयम (Supreme Self-Restraint)

संयम रखने का सीधा सा तात्पर्य है नियंत्रण रखने से। स्वयं के लिए एक लक्ष्मण रेखा डालने से। स्वयं को नियमबद्ध करने से। और ये संयम हमे अपने व्यवहारिक जीवन में ही रखना है। क्या-कब-कहाँ-कितना-कैसे इन सभी का मापदंड तय करना ही संयम धर्म का पालन करना होता है। यह संयम हम जब अपने खाने-पिने पर रखेंगे तो कई बिमारियों से बचेंगे। शब्दों पर रखा हुआ संयम, सम्बन्धो को बिगड़ने से बचाएगा, अपनी लालसाओं पर रखा हुआ संयम आपको अनावश्यक खर्चों से बचाएगा । हाँ, मैं मानती हूँ की मन को रोकना कठिन हैं परन्तु हम प्रयास तो कर सकते है, संयमित होने का। अपने लिए छोटे-छोटे नियम बनाये और उन पर दृढ रहें। धीरे-धीरे आप महसूस करेंगे की नियमित होते हुए आप नियंत्रित हो गए और नियंत्रण ने आपको संयम रखना सीखा दिया।

सातवाँ धर्म: उत्तम तप (Supreme Penance)

तपस्या का उद्देश्य इच्छाओं और वासनाओं को नियंत्रण में रखना है। तपस्या से पुण्य कर्मों का प्रवाह होता है। तप करने के अर्थ केवल आहार का त्याग नहीं होता। तप तीन तरह से होता है – शारीरिक, शाब्दिक, और मानसिक। शारीरिक तप में आहार त्याग के साथ कम आहार, कुछ प्रकार के खाद्य पदार्थों पर प्रतिबंध, स्वादिष्ट भोजन आदि से परहेज करना भी आता है। शक्ति के अनुरूप त्याग करिये और शक्ति के अनुरूप तपस्या करिये। मानसिक तप आपको मन से करना होता है। जब तक मन में ठानेंगे नहीं तप नहीं कर पाएंगे। मन की प्रसन्नता, शान्त भाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्त:करण के भावों की भली-भाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मानसिक तप कहा जाता है। और आता है शाब्दिक तप – वाक-संयम, अर्थात कोई अपशब्द बोले तो उस समय मौन रख लें। प्रतिउत्तर देकर आप अपने मन और शब्द दोनों भ्रष्ट करेंगे। अतः तप को अपने जीवन का छोटा सा हिस्सा बनाना आज ही शुरू करे।

आँठवा धर्म: उत्तम त्याग (Supreme Renunciation)

त्याग – किसी वास्तु विशेष को छोड़ना; तन से और मन से। संग्रह करना उचित है, परन्तु उसके साथ में अपने भीतर उदारता और अनुग्रह का समावेश भी करना चाहिए। त्याग दो तरह से होता है – सर्वस्व और आंशिक। सर्वस्व त्याग कर दिया तो आप बने संत-साधू। वो आपके लिए कदापि संभव ना हो । इसीलिए सांसारिक जीवन में रहते हुए आंशिक त्याग करें। आंशिक त्याग का सीधा सम्बन्ध है दान से। स्कूल में संस्कृत में पढ़ा होगा – दानं भोगो नाशस्तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥ धन की तीन गति होती है- दान, भोग और नाश। इसमें से सबसे उत्तम गति दान की है। धन का दान, धन द्वारा अन्य वस्तु, दवाई, वस्त्र आदि का दान अच्छा माना जाता है। दूसरी गति भोग है। जो भी धन आपके पास है, उसका उचित भोग करना, अपने घर का निर्माण, बच्चों की शिक्षा, विवाह, प्रतिदिन जीवन में वस्तुओं का संग्रह तथा जीवन को सुख पूर्वक बिताने के लिए अपने धन का उपयोग करना श्रेष्ठ है। परन्तु जो दान और भोग नहीं करता उसका धन नष्ट हो जाता, चोरी हो जाता है। स्व-पर के अनुग्रह के लिए अपने धन का त्याग करना दान हैं। अतः जब जहाँ जैसे अवसर मिले दान भी दीजिए, योगदान भी दीजिए।

नौवाँ धर्म : उत्तम आकिंचन्य (Supreme Non-Attachment)

आकिंचन्य – खाली हो जाना।खाली होने से अभिप्राय है कि अंदर बाहर सब तरफ से त्याग करना। “मैं”, “मैंने” और “मेरे” का अंतर्मन से त्याग करना ही उत्तम आकिंचन धर्म है। सरल शब्दों में कहे तो – खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जाना है। ना यहाँ कुछ आपका है ना मेरा। ये शरीर जला दिया जाना है, राख बन जायेगा, ये सब कमाया हुआ, संगृहीत धन-संपत्ति यहीं रह जाना है। इस शाश्वत सत्य से परिचित होने पर भी हम क्यों जीवन भर कमाने के पीछे भागते रहते है? कबीर दास की रचित कुछ पंक्तियाँ भी इसी बात का सन्देश देती है –

माटी चुन चुन महल बनाया,
लोग कहें घर मेरा।
ना घर तेरा, ना घर मेरा ,
चिड़िया रैन बसेरा।
कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी,
जोड़ भरेला थैला।
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
संग चले ना धेला
उड़ जाएगा हंस अकेला।
जग दो दिन का मेला।

शरीर, सम्पत्ति, सामग्री और सम्बन्धी ये चारों उत्तम आकिंचन में बाधक हैं। विज्ञान कहता है पानी में वही वस्तु डूबती है जिसमें भार होता है इसीलिए अगर आपको भी मिथ्या विश्वास, क्रोध, अभिमान, छल, लोभ, हँसी, पसंद, नापसंद, विलाप, भय, घृणा, काम वासना से ऊपर उठना है तो सर्व प्रथम अपने मन में आकिंचन्य धर्म का पालन करिये।

दसवां धर्म: उत्तम ब्रह्मचर्य (Supreme Celibacy)

ब्रह्मचर्य दो शब्दों से मिल कर बना है। ब्रह्म अर्थात आत्मा और चर्या मतलब रहने के लिए। निश्चय अपनी आत्मा में निवास करने का अर्थ है ब्रह्मचर्य। आत्मा में निवास करके ही आप ब्रह्मांड के स्वामी बन सकते हैं। आत्मा के बाहर रहने से आप इच्छाओं के दास बन जाते है। जो अपनी आत्मा के जितना पास है वह उतना बड़ा ‘ब्रह्मचारी’ है। केवल स्त्री-पुरुष का एक दूसरे से दूर हट जाना ही ब्रह्मचर्य नहीं होता है; ब्रह्मचर्य का अर्थ होता है आँखों में पवित्रता

महापर्व पर्युषण या दशलक्षण धर्म का सार

पर्यूषण पर्व का मूल उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करके आवश्यक विधाओं पर ध्यान केंद्रित करना, पर्यावरण का शोधन करना तथा संत और विद्वानों की वाणी का अनुसरण करना है। दस धर्म वे उदात्त जीवन मूल्य हैं, जो हर व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए जरूरी हैं। जैन धर्म की त्याग प्रधान संस्कृति में पर्युषण पर्व का अपना अपूर्व एवं विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। यह एकमात्र आत्मशुद्धि का प्रेरक पर्व है इसीलिए यह पर्व ही नहीं, महापर्व है। जैन लोगों का सर्वमान्य विशिष्टतम पर्व है। पर्युषण पर्व – जप, तप, साधना, आराधना, उपासना, अनुप्रेक्षा आदि अनेक प्रकार के अनुष्ठानों का अवसर है। पर्युषण का अर्थ है –‘परि‘ यानी चारों ओर से, ‘ उषण ‘ यानी धर्म की आराधना। अपने चारों ओर फैले बाहर के विषय – विकारों से मन को हटा कर अपने घर में आध्यात्मिक भावों में लीन हो जाना। पर्युषण का एक अर्थ है – कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी अतः यह पर्युषण पर्व आत्मा का आत्मा में निवास करने की प्रेरणा देता है।

सोनम के शब्द हमेशा इसी सोच के साथ लिखे जाते है की पढ़ने वालों को कोई जानकारी मिले। लेख कैसा लगा कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताइयेगा।

जय जिनेन्द्रI


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2 Comments on “दिगम्बर जैन महापर्व पर्यूषण या (10) दशलक्षण धर्म”

  1. संक्षेप में, जीवन जीने के बहुमूल्य रहस्य दिए गए हैं।
    साधुवाद।

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