9 महिलायें जिन्होंने घर और काम दोनों में तालमेल बैठाया | 9 Women Who Are Real Life Example


नमस्ते पाठकों 🙏🏻

प्रति वर्ष 8 मार्च को विश्व के कई क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति प्यार, प्रशंसा और सम्मान जताने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) मनाया जाता है। वैसे तो सृष्टि रचयिता की अनुपम कृति नारी के लिए कुछ भी लिखना कम ही होगा परंतु उनके नारीत्व के सम्मान में जो भी हो कहना ज़रूरी हो जाता है। 

इस ब्लॉग में गृह प्रबंधक शब्द का उपयोग किया गया है आमतौर पर हम जिन्हे गृहणी, हाउस वाइफ या होममेकर कहते है उनके लिए।  क्यूंकि मेरा ऐसा मानना है कि जब संस्थाओ, संगठनों और अन्य व्यवसायिक जगहों पर प्रबंधन का कार्य करने वाले प्रबंधक (मैनेजर) कहलाते है तो घर का संचालन और प्रबंधन जिनके हाथ में है वे गृह प्रबंधक या होम मैनेजर क्यों नहीं कहला सकती?

चलिए इस वर्ष sonamkeshabd की ये ब्लॉगपोस्ट भी समर्पित है उन 9 महिलाओं को जिन्होंने या तो परिवार के लिए नौकरी छोड़ी या करी या फिर आपसी तालमेल से दोनो को निभाया। 

नाम- रेमी श्रीवास्तवउम्र- 48क्या करती है- गृह प्रबंधकशादी को कितना समय हुआ- 25 वर्षकितने बच्चे है- 2 बेटियाँ1995 में शादी के बाद अपने इंजीनियर पति महोदय के साथ मुंबई में बस गई। समय पंख लगा कर उड़ा और आँगन में दो बेटियाँ आ गई। बेटियों के लालन-पालन में अपने लिए समय निकालना मुश्किल था। इसीलिए जब बेटियों ने स्कूल जाना शुरू किया तो रेमी ने भी शिक्षिका के पद पर एक स्कूल जाना शुरू कर दिया। बेटियों को स्कूल भेज कर रेमी अपने पति के साथ अपने स्कूल जाने लगी। सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा था। अपने काम के साथ रेमी अपनी बेटियों की अच्छी परवरिश पर भी पूरा ध्यान दे रही थी। कुछ सालों के बाद बड़ी बेटी ने महाविद्यालय में अड्मिशन लिया; जिसके परिणामस्वरूप छोटी बेटी स्कूल से आकर अकेले रहने लगी। तब रेमी ने नौकरी छोड़ कर घर संभालने का निर्णय लिया। आज उनकी बड़ी बेटी डॉक्टर बन चुकी है और छोटी इंजीनियरिंग में प्रवेश की तैयारी में जुटी है। अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनता देख आज रेमी को खुद से कोई शिकायत नहीं है। फ़िलहाल रेमी किताबें पढ़ती है, लिखती है और सामाजिक कार्यों में रुचि लेती है। रेमी का मानना है की- “अगर समय का उचित उपयोग करे और घर और बाहर दोनो की ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभा सकते है।”

नाम- CA रंजिता शर्माउम्र- 44क्या करती है- चार्टेड अकाउंटंटशादी को कितना समय हुआ- 17कितने बच्चे है- 1 बेटी और 1 बेटारंजिता का मानना था की, “when I am living, why can’t I earn my living?” इसी विचार से शुरू हुआ उनका CA बनने का संघर्ष भरा सफ़र। संघर्ष इसीलिए क्यूँकि उन्होंने असफलता का स्वाद भी चख़ा है और उससे आगे भी बढ़ी है। इसी संघर्ष ने उनमें सवेंदनशीलता को बढ़ाया। उन्हें अपने CA होने का गर्व है, पर ग़ुरूर नहीं।अपनी CA की पढ़ाई उन्होंने शादी के बाद पूरी करी जिसमें वो मानती है की उनके ससुराल पक्ष, पति और माता-पिता  ने भरपूर सहयोग दिया। अपनी सफ़लता का श्रेय रंजिता इन सभी को देती है। 2.5 साल तक एक CA फ़र्म में नौकरी भी करी। अपने बेटे के जन्म के बाद उन्होंने नौकरी से दूरी बना ली और असायन्मेंट बेसिस पर इंटर्नल ऑडिट्स करने लगी। रंजिता कहती है, “एक महिला को उतना ही manage करना चाहिए जितना वो करना चाहती है। हम आठ हाथों वाले octopus तो है नहीं और ना ही किसी स्पर्धा में भाग ले रहे है जो अपने आप को सबसे बेस्ट कहलवाना हो। हमें बस खुलकर जीना चाहिए। Independence is the state of mind where you are contented and happy with whatever you have, whatever you foregone but you should make your own choices  in life.” फ़िलहाल रंजिता घर पर ही tutions लेती है और असायन्मेंट बेसिस पर काम करती है।

नाम- सबिहा अहमदउम्र- 46 क्या करती है- गृह प्रबंधकशादी को कितना समय हुआ- 27 वर्षकितने बच्चे है – 2 बेटे व 1 बेटी17 साल की उम्र में जब शादी हुई तब चाय भी बनाना नहीं आता था। अपने अम्मी-अब्बा की लाड़ली सबिहा ने कभी मायके में कोई काम नहीं किया और ससुराल पहुँचते ही खेलने-पढ़ने वाली उम्र में अपनी कैन्सर पीड़ित सास की सेवा में लग कर एक परिवार की ज़िम्मेदारी संभाल ली। ऐतिहासिक जगहों पर घूमने और नए लोगों से मिलने का शौक़ रखने वाली मिलनसार सबिहा ने भी आत्मनिर्भर बनने के लिए नौकरी करने का सपना देखा था पर पारिवारिक जिम्मदारियों के चलते अपने सपने को पूरा नहीं कर पायी। अब अपनी बेटी रूखसार को आत्मनिर्भर बनते देख कर अपना सपना पूरा होने का इंतज़ार कर रही है।

नाम- इला सक्सेना 
उम्र- 47क्या करती है- अध्यापिका शादी को कितना समय हुआ- 20 वर्षकितने बच्चे है- 2 बेटियाँस्पष्टवक्ता व रूढ़िवादी सोच से अलग खुले विचारों वाली इला का मानना है कि, “कामकाजी होना उतना कठिन नहीं होता जितना समझा जाता है। परिवार *का* साथ *मिलने* से घर और नौकरी में सामंजस्य बैठाना आसान हो जाता है। प्राथमिक मुश्किलें तो हर कार्य में आती है; जिन्हें teething problem कह सकते है और हर मुश्किल अपने पीछे उसका समाधान छुपाए होती है; ज़रूरत उस समाधान को खोजने की होती है। हमारे सामाजिक परिक्षेत्र में नारी को multitasking होना ज़रूरी माना जाता है। परंतु कोई भी नारी super woman नहीं होती है।” आगे इला बताती है कि अगर वे घर को प्राथमिकता देती तो काम suffer होता और काम को, तो घर। इसीलिए उन्होंने घर के कामों के लिए helping hand रखें क्यूँकि उनके लिए उनका काम उनकी पहचान है। वे नौकरी और घर के बीच के तालमेल को बैठना जानती है। sonamkeshabd के सभी पाठकों के लिए इला का संदेश है कि, “आप जैसा चाहते है जीवन उसी साँचे में ढल जाता है। अपने अस्तित्व और अपनी अस्मिता को कभी दाँव पर ना लगने दे। ख़ुश रहिए; यह आपका अधिकार है।” हाल ही में इला के पति को ह्रदयघात हुआ था; जिससे अब वे उभर चुके है और स्वस्थ है। परंतु उस समय इला ने अपनी बुद्धिमत्ता और हिम्मत से काम लेते हुए उन्हें सही समय पर ना सिर्फ़ हॉस्पिटल पहुँचाया बल्कि पूरी परिस्थिति पर अद्भुत नियंत्रण रखा। दोनो बेटियों, सास, रिश्तेदारों और पड़ोसियों को कब और कितना मिलने देना है इस बात को लेकर इला स्पष्ट थी। चर्चा को विराम देने से पहले इला सभी पाठकों को ये संदेश देना चाहती है की-मुश्किलें सभी के जीवन में बिना बताए आती है, उनका कोई विशेष रूप या माप नहीं होता। ऐसे  में समझदारी और हिम्मत से काम ले।बुरे वक़्त के लिए स्वयं को तैयार रखें और सदैव अपने पास Plan B और C रखें। महिलाएँ कभी ये ना सोचे की, “हाय! मैं कैसे करूँगी?” अपने आप को संबल दे और अपनी क़ाबिलियत पर भरोसा रखें।

नाम- स्वाति शुक्ला उम्र- 40 वर्षक्या करती है- गृह प्रबंधकशादी को कितना समय हुआ- 15 वर्षकितने बच्चे है– 2 बेटियाँInorganic Chemistry में Masters की डिग्री प्राप्त स्वाति आज उतनी ही निपुणता से अपने परिवार का संचालन करती है जितनी निपुणता से वो कभी केमिस्ट्री की प्रयोगशाला में प्रयोग करती थी। दोनो बेटियों के साथ उनकी सहेलियों को भी खुद घर में पढ़ाने वाली स्वाति का कहना है की पढ़ाई तो सभी के लिए ज़रूरी है; फिर चाहे आप घर सम्भालें या बाहर। एक बेटी, पत्नी, माँ, भाभी और बहन के सभी दायित्वों का पूरी तन्मयता से पालन करने वाली स्वाति अपनी बड़ी बेटी की टेनिस और पीयानो और छोटी बेटी की भरतनाट्यम् क्लास के लिए उतना ही ध्यान देती है जितना की रसोई में। पारंपरिक व्यंजनों के साथ केक बनाने में भी पारंगत स्वाति कभी इन सब की क्लास तो नहीं खोलना चाहती पर जो कोई पूछता है उसे बड़ी बारिक़ी के साथ विधी बताती है। फ़िलहाल स्वाति अपना ख़ाली वक़्त टहलकर, बाग़वानी कर के, गाने सुनकर और प्रभु भक्ति में बिताना पसंद करती है।

नाम- शेख़ दिलशादउम्र- 43 वर्षक्या करती है- गृह प्रबंधकशादी को कितना समय हुआ- 23 वर्षकितने बच्चे है- 1 बेटी और 1 बेटा1997 में जब दिलशाद का निकाह तय हुआ तो वो महज़ 19 साल की थी। 10वी पास दिलशाद और पढ़ना चाहती थी इसीलिए अम्मी-अब्बा से गुज़ारिश कर के अपनी डिग्री पूरी कर ली। आगे और पढ़ने की इच्छा और नौकरी कर के आत्मनिर्भर होने के सपने को मायके में ही छोड़ कर दिलशाद अपने पति के साथ आंध्र प्रदेश से छत्तीसगढ़ में आ बसी। राज्यों के अंतर की वजह से भाषा में भी अंतर आ गया, इस बदलाव के साथ संतुलन बनाते हुए दिलशाद ने अपनी ग्रहस्थी रायपुर से 20 km दूर एक गाँव में बसाई। शहर में पली-बड़ी एक लड़की का अपने बच्चों के साथ गाँव में रहना कई मुश्किलों का सबब था। गाँव से शहर आने के लिए स्कूल बस की सुविधा नहीं थी, खुले ऑटो में बच्चों को भेजना और उनके घर लौटने तक उनके इंतज़ार में रहना यही दिलशाद की दिनचर्या बन गई थी। अपनी डिग्री का उपयोग करते हुए दिलशाद ने 10वी क्लास तक अपने बच्चों को खुद पढ़ाया। घर के छोटे-मोटे कामों के लिए अपने पति पर निर्भर ना रहते हुए दिलशाद पब्लिक ऑटो से आना-जाना करती; फिर चाहे बच्चों के स्कूल का पर PTM हो या घर का कोई काम। शादी के बाद 20 साल दिलशाद एक ऐसे गाँव में रही जहाँ मनोरंजन के लिए भी कोई सुविधा नहीं थी। साड़ियों और बेड-शीट्स पर हाथों से एम्ब्रॉड्री करने में निपुण होने के साथ ही दिलशाद ने शादी के पहले भरतनाट्यम् के स्टेज पर्फ़ॉर्मन्स भी दिए है। शादी और बच्चों के बाद पारिवारिक जिम्मदारियों के चलते उन्हें ये सब छोड़ना पड़ा। दिलशाद कहती है कि जीवन के इतने उतार-चढ़ाव देखने के बाद उन्हें अपने महिला और गृहिणी पर गर्व है क्यूँकि एक गृहिणी होना अपने आप में बिना सैलरी का फ़ुल-टाइम जॉब है।

नाम- लक्ष्मी उपाध्यायुला उम्र- 41 वर्षक्या करती है- गृह प्रबंधकशादी को कितना समय हुआ- 20 वर्ष कितने बच्चे है- 1 बेटा और 1 बेटीमिलनसार और ख़ुशमिज़ाज लक्ष्मी अपने नाम के अनुरूप ही व्यवहार भी रखती है। जिससे मिलती है अपना बना लेती है; सहयोग करने में सदैव आगे और अपनी नेतृत्व क्षमता से बड़े कामों को आसानी निपटा देती है। शादी के लक्ष्मी एक शासकीय संस्था में बतौर PA पदस्थ थी। समय के साथ जब उनके आँगन में कृष्णा और सिरी ने जन्म लिया तो माँ का भरपूर प्यार देने के लिए उन्होंने नौकरी का त्याग किया। अपने दोनो बच्चों की परवरिश के साथ ही उन्होंने अपने सिलाई, बाग़वानी और चित्रकारी के शौक़ को भी बढ़ने दिया। लक्ष्मी कहती है कि, “एक नारी होने के साथ हम कई किरदार एक साथ निभाते है। हम कभी पत्नी होते, कभी बहू तो कभी माँ। गृहिणी होने का मतलब सिर्फ़ घर सम्भालना नहीं होता; बल्कि घर से जुड़े हर सदस्य और वस्तु की समुचित देख-रेख भी होता है।” लक्ष्मी के अनुसार, “ जब मेरे बच्चे अपने पैरों पर खड़े होने पर भी भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान रखेंगे, उस दिन मैं खुद को एक सफल नारी और माँ समझूँगी।”

नाम- दिव्या पांडेयउम्र- 40 वर्षक्या करती है- प्रधान अध्यापिका/शिक्षिकाशादी को कितना समय हुआ- 17 वर्षकितने बच्चे है- 1 बेटी और 1 बेटासादगी और सुंदरता से परिपूर्ण दिव्या विवाहपूर्व बेफ़िक्री के साथ पूरी ज़िंदादिली से जीती थी। विवाह पश्चात ज़िंदगी ने उन्हें जो सबसे पहला सबक़ सिखाया वो था ‘ज़िम्मेदारी’। जो लड़की अब तक बेपरवाह थी उसे अब गृहस्वामिनी बनकर अपने पति की सीमित आय में घर चलाना था। यहीं से दिव्या ने तय किया की वे घर सम्भालने के साथ अपने पति के कंधो से बोझ भी आधा करेंगी। एक बेटी को जन्म देने बाद वाणिज्य स्नातक दिव्या ने बाहरी दुनिया में अपना सफ़र एक शिक्षिका के रूप में शुरू किया। दिव्या हमेशा से व्यवसाय करना चाहती थी परंतु समय की माँग को देखते हुए ना चाहते हुए भी दिव्या ने शिक्षिका बनाना मंज़ूर किया। समय के साथ हालात बेहतर होने लगे और तभी दिव्या की गोद में उनका बेटा आ गया। अपने बेटे के आने के बाद दिव्या ने तय किया की अब रुकना नहीं है। उन्होंने स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरू कर दी। दिव्या बताती है कि, “एक 2-3 महीने का बच्चा माँ को हर पल अपने पास चाहता है ऐसे में पढ़ाई को समय देना मुश्किल था। अपनी माँ और पति के सहयोग से मैंने अपनी पढ़ाई पूरी करी। मेरी माँ ने ना सिर्फ़ मेरे बच्चों को सम्भाला बल्कि इस बात का भी पूरा ध्यान रखा की मैं ठीक से पढ़ पाऊँ।” दिव्या अपने पति के प्रति आभार प्रकट करते हुए आगे बताती है की उनके पति की सोच समाज की रूढ़िवादी सोच से कई ऊपर और खुली है। उन्होंने कभी मुझे नौकरी या पढ़ाई के लिए बाहर जाने से नहीं रोका वरन सदैव मेरा हौंसला बढ़ाया। दिव्या अपने बच्चों को भी आज धन्यवाद देते हुए कहती है कि, “बच्चों के सपोर्ट के बिना मैं आज जो कुछ भी हुँ वो संभव नहीं हो पाता।” आज दिव्या को अपने शिक्षिका होने पर गर्व है। वे आज बड़ी सहजता से बाल मनोविज्ञान को समझती है। sonamkeshabd के सभी पाठकों के लिए दिव्या ये संदेश देती है कि, “जीवन हमेशा वैसा नहीं है जैसा आपने कल्पना की है, यह आपका सबसे बुरा सपना हो सकता है और सबसे सुंदर सपना भी हो सकता है लेकिन अंत में यह मायने रखता है कि आप इसे कैसे प्रबंधित करते हैं। कई बार आपके पास बहुत थकाऊ दिन होते हैं लेकिन आपके बच्चे आपसे उनके साथ खेलने की उम्मीद करते हैं, इसलिए यह कभी भी आसान नहीं रहा। लेकिन मेरा विश्वास है कि एक नारी ईश्वर के किसी चमत्कार से कम नहीं होती। हर नारी खुद को धन्य माने। इसलिए हम महिलाओं को भगवान की सबसे सुंदर रचना कहते हैं।

नाम- झांसी संपथउम्र- 41 वर्षक्या करती है- गृह प्रबंधकशादी को कितना समय हुआ-22 वर्षकितने बच्चे है- 1 बेटा – 1 बेटीझांसी अपने परिवार में इकलौती बहु होने से शुरुआत से ही जिम्मेदारी से पूर्ण रही है।अपने रिश्तों को हमेशा सहेज कर रखने की कोशिश करते हुए झांसी बताती है की, “शादी के बाद जीवन में संतुलन रखने के लिए पहले हमको धैर्य रखना बहुत ज़रूरी है। हर परिवार में छोटी-मोटी समस्याएँ आती ही रहती है; शांत स्वभाव से हम कई सारी समस्याओं का समाधान निकाल सकते है।” अपने ख़ाली समय में झांसी को संगीत सुनना पसंद है और खुद को खुश रखने के लिए वो ख़रीददारी भी दिल खोल कर करती है।

सार यह है की 

अपने अंदर छुपी अद्भुत प्रबंधन क्षमता से नारी घर, परिवार, नौकरी हर जगह अपना अस्तित्व बना सकती है। बेशक पुरुष घर के वित्तीय प्रवंधन के आधार होते है, परंतु कमाए हुए पैसो का सदुपयोग करने की कला स्त्री के पास होती है। चाहे परिवार के लिए नौकरी छोड़ना हो या करना हो या फिर नौकरी और परिवार में तालमेल बैठाकर चलना हो, यह हुनर सिर्फ नारी के ही पास है। 

समस्त नारी शक्ति को नमन 🙏

जल्दी मिलते है अगले ब्लॉग के साथ.


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